Tuesday, January 18, 2011

WHAT ENGLISH OWES TO SANSKRIT

SHER AGRAWAL

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What English owes to Sanskrit

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Mohan Gupta Mon, Jan 17, 2011 at 8:22 PM
To: pii@ndf.vsnl.net.in
What English owes to Sanskrit

Derived from Sanskrit, the English word “husband” actually connotes a person whose hands have been tied to that of a woman so that he may not run after other women hereafter, according to

a historian.

Mr. P.N. Oak has authored a book, “Fowlers Howlers”, has sought to establish that the English language as a whole has been derived from Sanskrit.

In a Vedic wedding, the groom grasps the right hand of the bride and a kankan (thread) is tied around the couple’s wrists as a symbol of the martial union and vow.

The Sanskrit terminology of the above procedure is “hustbandh, hand – tie” from which the English word “husband” has evolved. Mr. Oak claimed.

Although he has not explained the Sanskrit origin of the word “groom”, he however goes on to add that “bride” has evolved out of “vadhu’ which came to be pronounced as “bradhu”.

Marriages are described as “weddings”, a word which has originated from “veddings” because they were solemnized by chanting Vedic mantras, reads “Fowlers Howlers”

Westerners today cling, though unknowingly, to Vedic martial rites and Vedic educational terminology, writes Mr. Oak, who has worked as a journalist for more than 30 years.

To sustain this claim, cited an example. According to Vedic practice, a bride when crossing the threshold to enter her martial home for the first time kicks a pot full of rice grains, as a symbolic

gesture that with her entry into the groom’s home, there would be plenty of food grains lying around for the family’s upkeep.

In some western Christian countries, brides perpetuate that practice by kicking a bottle of champagne instead. The author has, however not explained whether this practice was to ensure a perpetual supply of champagne.

“Fowler Howlers” has cited example to prove that English words have been derived from Sanskrit, posed problems concerning the usage of English words, and, at times, even ridiculed the concise Oxford dictionary of current English edited by H.W. Fowler and F. G. Fowler by saying, “English is a branch of Sanskrit. Unaware of that, Oxford dictionary’s etymological explanations have gone awry.”

Giving an example of how the etymological explanations have gone haywire, Mr, Oak notes that the suffix “er” in English denotes a person who carries out a certain act or activity. For instance, a lecturer is a person who lectures while a labourer is one who labours. Based upon this reasoning, a widower would signify person who renders a married woman a widow by murdering her husband.

Incidentally, the word “widow” says Mr. Oak, who has authored books like “Great Britain was Hindu Land,” has been derived from The Sanskrit word “Widhwa.”

अंग्रेजी में संस्कृत स्रोत - - डॉ. मधुसूदन

‘सप्तांबर, अष्टांबर, नवाम्बर, दशाम्बर’ आपके मनमें, कभी प्रश्न उठा होगा कि अंग्रेज़ी महीनों के नाम जैसे कि, सप्टेम्बर, ऑक्टोबर, नोह्वेम्बर, डिसेम्बर, कहीं, संस्कृत सप्ताम्बर, अष्टाम्बर, नवाम्बर, दशाम्बर जैसे शुद्ध संस्कृत रूपोंसे मिलते क्यों प्रतीत होते हैं? विश्व की और विशेषतः युरोपीअन की भाषाओं में संस्कृत शब्दों के स्रोत माने जाते हैं।

इस विषय की कुछ कडियां, जो आज शायद लुप्त हो चुकी हैं, उन्हें जानने, इस लेखकने जो काम किया है, वह आपके सामने प्रस्तुत करता हूं। जो जुड़ती कडियों का अनुसंधान मिलता है, वह पाठकों के सामने रखने में, एक सांस्कृतिक गौरव की अनुभूति भी छू कर आह्लादित कर देती है। आप सभी को इस आनंद-गौरव में सहभागी होने के लिए, आमंत्रण हैं।

क्या यह आकस्मिक घटना है? एक साथ अनुक्रम में, निरंतर चारों महीनों के नाम अंग्रेज़ी में आएं, ऐसी, आकस्मिक घटना होनेकी संभावना, नहीं के बराबर है। जो विद्वान संभावना (प्रॉबेबिलिटी) की, अवधारणा से परिचित है, वें इसे आकस्मिक मानने के लिए तैय्यार नहीं होंगे। पर प्रश्न यह भी है, कि, यदि सप्ताम्बर-सेप्टेम्बर है, तो वह अंग्रेजी कॅलेंडर में, क्रम में नववां महीना कैसे हुआ? और उसी प्रकार, फिर अष्टांबर, -ऑक्टोबर-दसवां, नवाम्बर-नोह्वेम्बर-ग्यारहवां, और दशाम्बर-डिसेम्बर-बारहवां, कैसे हुए?

इस प्रश्न का उत्तर ढूंढने और संदर्भ खोजने के लिए, एन्सायक्लोपिडीया ब्रिटानिका का विश्व कोष छानकर देखा, और कुछ तथ्य हाथ लगे। संक्षेप में निम्न बिंदुओं की ओर ध्यान आकर्षित हुआ। इस विश्व कोष में, कॅलेन्डर के विषय में वैसे और भी जानकारी है। ईसवी सन, १७५० के आसपास आज कल उपयोग में लिया जाता कॅलेंडर स्वीकारा गया, जिसे ग्रेगॅरियन कॅलेंडर के नाम से जाना जाता है। उसके पहले ज्युलियन कॅले ंडर उपयोग में लिया जाता था। ऐसा भी दिखाइ देता है, कि, पुराने कॅलेंडरों के अनुसार मार्च महीने से ही वर्ष प्रारंभ होता था। यह वस्तुस्थिति ध्यान देने योग्य हैं, क्यों कि, यदि, मार्च महीने से ही वर्ष प्रारंभ हो, तो, सितम्बर सातवां महीना होता है, फिर अक्तुबर आठवां, नवम्बर नववां, और डिसम्बर दसवां महीना होगा।

दूसरा एक सहज दिखाइ देनेवाला तथ्य भी, मार्च से ही नये वर्ष के प्रारंभ की, पुष्टि करता है। वह है, फरवरी में, हर चार वर्ष में आता हुआ, लिप वर्ष का सुधार। कोई भी सुधार सामान्यतः अंत में ही किया जाता है। बहुत सारी ब्यौपारी पेढियां, वर्ष के अंत में ही, हिसाब बराबर करती हैं। आय-कर(Income Tax)का हिसाब भी, वर्षानुवर्ष डिसम्बर के अंत तक, देना होता है।

तो यह प्रश्न कि, फरवरी में ही क्यों, लिप वर्षका सुधार आता है? बडा ही तर्क संगत है। इसका उत्तर कहीं, इतिहास की जमा धूल के नीचे, छिप कर बैठा है। लगता है, कि कभी न कभी तो फरवरी वर्ष का अंतिम महीना रहा होगा। कोइ वर्ष के बीच ही कारण बिना, ऐसा सुधार करे, यह संभव नहीं, मैं तो ऐसा होना तार्किक और वैज्ञानिक दृष्टिसे असंभव मानता हूं। एक और कारण भी स्पष्ट है, कि अन्य माह ३० या ३१ दिन के होते हैं ; फिर अकेले फरवरी को २८ या २९ दिन देकर पक्षपात किया गया? तो यह फरवरी का लिप वर्ष का सुधार, एक; और २८ या २९ दिनके अवधि का माह होना, दूसरा; यह दोनो तथ्य फरवरी के वर्षान्त माह होने की पुष्टि करते हैं। अर्थात् मार्च कभी तो पहला महीना रहा होगा, यह तथ्य भी इसीसे प्रमाणित होता है।

तीसरा तथ्य भी इस के साथ जोडना आवश्यक है, वह यह है, कि, भारतीय शालिवाहन शक का वर्ष गुडी पडवा (वर्ष प्रतिपदा, युगादि)से ही माना जाता है। और हिंदू तिथि और अंग्रेज़ी डेट प्रायः आगे पीछे हुआ करती है। महाराष्ट्र, कर्नाटक सहित दक्षिण में सभी परंपराएं शालिवाहन शक मानती हैं। शालिवाहन शक के वर्ष का प्रारंभ, वर्ष-प्रतिपदा जो मार्च में आती है, उसी से होता है। इस ईसवी सन २०१० के वर्ष में, १६ मारच को शक संवत १९३२ प्रारंभ हुआ था, और साथ साथ विक्रमी संवत २०६७ भी प्रारंभ हुआ था। युगाब्द का ५१११ वां वर्ष भी इसी दिनसे प्रारंभ हुआ था।

पाठकों को अब ध्यान में आया होगा, कि क्यों, सितम्बर सातवां, अक्तुबर आठवां, नवम्बर नववां, और डिसम्बर दसवां होने का आभास होता है। वैसे अम्बर अर्थात, आकाश भी संस्कृत शब्द ही है। हो सकता है कि सप्ताम्बर = सप्त+अम्बर का अर्थ संदर्भ भी, आकाश का सातवां भाग इस(एक राशि) अर्थ की व्युत्पत्ति से जुडा हो।

इंग्लैंड का इतिहास: इंग्लैंड में सन १७५२ तक २५ मार्च को नवीन वर्ष दिन मनाया जाता था। सन १७५२ में पार्लामेंट के प्रस्ताव द्वारा कानून पारित कर, नवीन वर्ष का प्रारंभ १ ली जनवरी को बदला गया था।

मार्च २५ को नये वर्षका प्रारंभ मानने के पीछे, क्या ऐतिहासिक कारण हो सकता है? यह भी कहीं इतिहास के अनजाने अज्ञात रहस्यो में खो गया है। आज कुछ अनुमान ही किया जा सकता है। कारण हो सकता है, कि इंग्लैंड का वैदिक गुरुकुल शिक्षा पद्धति और वैदिक पंचांग से जिस वर्ष संबंध टूटा होगा, उस वर्ष वैदिक गणित के अनुसार २५वी मार्च को प्रारंभ होनेवाला, भारतीय नव वर्ष रहा होगा।

संभवतः, जिस प्रकार घडी को उलटी दिशा में घुमाते घुमाते हर बीते हुए दिन का समय और वार हमें प्राप्त हो सकता है, उसी प्रकार कॅलेंडर को भी उलटी दिशा में गिनते गिनते हम २५ वी मार्च से प्रारंभ होने वाला शक संवत खोज सकते हैं।

मध्य रात्रि में सु प्रभातम्‌? और एक रहस्यमय प्रथा के प्रति प्रश्न खडा होना स्वाभाविक है, वह है, इंग्लैंड में मध्य रात्रिके समय दिनका आरंभ माना जाना। मध्य रात्रिमें, रात के १२ बजे, Good Morning कहते हुए नया दिन आरंभ कर देते हैं। मैंने रात के १२ बज कर १ मिनट पर, मध्य रात्रि के घोर अंधेरे में, रेडियो संचालक को गुड मॉर्निंग कहते हुए सुना है। यह मुझे तो कुछ अटपटा प्रतीत होता है। मध्य रात्रि के स मय सुप्रभातम्? तो, अचरज तो यह है, कि नया दिन रात को प्रारंभ होता हुआ मान लिया जाए। क्या, रातके १२ बजे जागकर कॅलेंडर की तारीख बदलनी पडेगी?

दूसरा प्रश्न इसी प्रथा से जुडा, यह भी है, कि, फिर मध्य रात्रि के बाद की बची हुई, दूसरे दिन की प्रातः तक की अंधेरे-युक्त रात्रि का क्या हुआ? मध्य रात्रि हुयी, और तुरंत एक क्षणमें, सारी शेष रात्रि को छल्लांग लगा कर सु प्रभातम्‌,। क्या कोई तर्क है, इसके पीछे? इसे कॅल्क्युलस की पारिभाषिक शब्दावलि में (Discontinuity) विच्छिन्नता, सातत्य भंग, तार्किक असंगति, या त्रूटकता इत्यादि कहते हैं। यह निश्चि� �� ही तर्कहीन ही लगता है। इस प्रश्न का कुछ तर्क संगत उत्तर भी निम्न परिच्छेद में देने का प्रयास किया है।

वास्तवमें, इंग्लैंडके रातके बारह बजे, भारतमें प्रातः है। वैदिक संस्कृति के अनुसार भारतमें, प्रातः ५:३० बजे सूर्योदय के साथ साथ तिथि बदली जाती थी। उज्जैन (भारत) और गीनीच (इंग्लैंड) के अक्षांश में ८२.५ अंशोका (डिग्रीका) अंतर है। उज्जैन या प्रयाग के अक्षांश ८२.५ है, जब ग्रीनीच के (०)-शून्य हैं। इस लिए, भारत में जब प्रातः के, ५:३० बजते हैं, तब ग्रीनीच, इंग्लैंड में पिछली रात के, १२ बजे होते हैं, होती तो मध्य रात्रि है, किंतु भारत की प्रातः से ताल मिलाने के लिए मध्य रात्रि के तुरंत बाद, शेष रात्रिकी ओर दुर्लक्ष्य करते हुए, गुड मॉर्निंग (सु प्रभातम्‌) हो जाती है। यह तर्क शुद्ध प्रतीत होता है। इस तथ्य की एक पुष्टि यह भी है, कि भारत को पूरब का देश भी माना जाता है, और ऐसे ही स्वीकारा जाता है। पाठकों को ’पूरब और पच्छिम” नाम का चलचित्र (मूवी)भी स्मरण होगा, जिसमें भारत को पूरब मा���ा गया था, और ऐतिहासिक दृष्टिसे सदा स्वीकारा भी गया है।

इसी संदर्भ में कुछ और भी विधान किया जा सकता है। वास्तव में, उत्तर और दक्षिण दिशाएं, पृथ्वी के, दो ध्रुवों के कारण तर्क शुद्ध हैं। पृथ्वी गोल घुमती है, और, उत्तर ध्रुव और दक्षिण ध्रुव दो स्थिर बिंदू हैं। परंतु, पूर्व दिशा का ऐसा नहीं है। एक मंडल में, या वृत्त में, किस बिंदु को संदर्भ बिंदू (Reference Point) माना जाए, इसका कोई तर्क नहीं दिया जा सकता। इस लिए संदर्भ बिंदू प्रयाग, या उज्जैन (जो, आज कल ���ाना जाता है) हो सकता है।

कॅलेंडर भी (हमारा कालांतर) संयोग से एक पुर्तगाली क्लायंट के साथ बातचीत करते समय सुना, कि पुर्तगाली भाषा में, अंग्रेज़ी कॅलेंडर के लिए ”कलांदर” शब्द प्रयुक्त होता है, जो शुद्ध संस्कृत ”कालांतर” से अधिक मिलता जुलता प्रतीत होता है। अब जानकारों को यह कालांतर, शुद्ध संस्कृत युगांतर, मन्वंतर, कल्पांतर इत्यादि शब्दों जैसा ही, शुद्ध संस्कृत प्रतीत हो, तो कोई विशेष अचरज नहीं।

Day, Night, Hour इत्यादि अब कुछ Day, Night, Hour इत्यादि शब्दों का विचार करते हैं। जो वास्तव में काल गणना विषय से ही जुडे हुए हैं। Day को दिवस शब्दके मूल धातु ”दिव” के साथ मेल है। इस दिव्‌ का अर्थ दिव्यता अर्थात प्रकाश के साथ जुडा हुआ है। अपने शब्द दिवस, दिन, दिव्यता, देव (प्रकाश युक्त हस्ति) दैव (देवों पर आधारित) दिवंगत (प्रकाशमें लीन हो चुका हुआ) ऐसे शब्दों का मूल भी यह दिव‌ धातु ही है। अंग्रेज़ी में यही दिव‌ धातु के मूल से उदभूत Divine (प्रकाशमान आकृति), Day (दिवस), Deity (दैवी आकृति), Divination ( दैवी सहायता से ढूंढना), इत्यादि शब्दोंका तर्कशुद्ध संधान किया जा सकता है। यह सारे शब्द दिव्‌ धातुसे उद्‌भूत प्रतीत होते हैं।

Night उसी प्रकारसे Night को संस्कृत ”नक्त” (अर्थात रात्रि) के साथ निकटता प्रतीत होती है। संस्कृतमें ”नक्तचर” रात्रि को विचरण करने वाले प्राणियों के लिए प्रयोजा जाता है। नक्त का अर्थ रात्रि, और चर का अर्थ विचरण करने वाला यह होता है। अंग्रेज़ी में भी Nocturnal Animal सुना होगा। इस Nocturanal का ”Noct” वाला हिस्सा ”नक्त” के साथ मिलता प्रतीत होता है। उच्चारण की दृष्टि से जैसे अष्ट से अख्ट,-अठ्ठ (प - राकृत और पन्जाबी ),–आठ (गुजराती/मराठी/हिंदी) और अंगेज़ी Eight ( उच्चारानुसारी अख्ट) इसे Night (उच्चारानुसारी नख्ट) से तुलना करने पर कुछ अधिक प्रकाश पडता है।

Hour का भी मूल ”होरा” इस संस्कृत शब्द से, जिस का अर्थ एक राशि में व्यतीत किया गया समय के अर्थ से लगाया जा सकता है। ज्योतिष को ”होरा” शास्त्र भी कहा जाता है।

यह व्युत्पत्तियां अंग्रेजी डिक्‍शनरियां क्यों दिखाती नहीं है? मुझे यह प्रश्न कई बार पूछा जाता है। मेरी दृष्टि में अनुमानित उत्तर शायद यह है, कि जब यह डिक्षनरियां रची गई, तब हम पर-तंत्र थे, और भारत में मॅकॉले प्रणीत शिक्षा प्रणाली लागु की गई थी; जो भारतियों को भारत की महानता के प्रति उदासीन रखना चाहती थी। सोचिए कि जिस भारत नें विश्व में गणित की आत्मा समझी जाने वाले अंकों का योगदा न किया, उन अंकों का उल्लेख भी अरबी अंक इस नाते से किया जाता था। बहुत से लोग आज भी उन्हे अरबी अंक ही मानते हैं; तब यह बात सरलता से समझ में आती है। पर हमें इस मति भ्रमित अवस्था से बाहर आना होगा, और गौरव अनुभव करते हुए, उपर उठना होगा।

संदर्भ:(१) एन्सायक्लोपेडिया ब्रिटानीका (२) विश्व इतिहास के कुछ विलुप्त पृष्ठ– पु. ना. ओक,(३) लेखक का ही, गुजराती त्रैमासिक, ”गुर्जरी” में प्रकाशित लेख,(४) लेखक की टिप्पणियां।

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From: mm gupta

When I studied in school, Sanskrit was a compulsory subject, in which
I obtained a letter mark (80%) in my School Final Exam, 1955. Sp its clear Sanskrit was still taught. But the career making in the styles laid down by the rulers after 1947, compelled be to abandon SANSKRIT. I became an electrical engineer in which there was no scope for me to practice SANSKRIT.
What I mean to say is, the principles adopted at the GOVERNMENT level were not congenial to practices in Sanskrit.
Still at home I have some practice of my own. But that’s a different matter.
Sanskrit, today, is accepted as a computer language as compared to all languages in the world. Why? Has the intelligencia thought over it? In British schools they adopted SANSKRIT as the language helps making more intelligent and logical framed students.
In India, the men at the helm of affairs CANT SEE all these facts! The British show is still on though the British themselves are changing!

This callousness has paved the way for -
1 distraction from the wisdom to be received from VAST WISDOM OCEAN available in literatures in SANSKRIT.
2 adoption of poor wisdom and resultant cultures of the foreign countries who, I am firmly believing, do not know the main cause of

getting a human birth.
3 resultant misdeeds at galore, which cause MISERIES to the citizen at large.
4 feelings of 'I know many things ' and ' I got these degrees' and a craze for 'money making in devilish ways'
NOT CARING FOR WHETHER PEOPLE AT LARGE are getting two square meals or not!
5 leading a life of extravagances, characterlessness and 'I don’t care 'attitudes
6 in short, all unwanted things that wee se in India today.

Pity is INDIA was a rich and self sufficient country even 300 years ago!
Then?
Wisdom lacking is the main reason
!
During British rule, the DEADLY MECAULAY SYSTEM OF EDUCATION resultantly making Indiana slave intellectually
is still discussed BUT NO PREVENTIVE ACTIONS ARE TAKEN YET!

Who will take it? The elected people by the present system adopted?

They are e NOT WISE AT ALL! They may be educated in multiples ways but WISDOM has evaded them totally! So? They can’t be

trusted ANY
MORE!
INSTALLATION OF SANSKRIT AS COMPULSORY LANGUAGE FOR DEALINGS IN INDIA IS ONE OF THE MAJOR

STEPS along with corrections in the present election system and over and above the democracy we are in!
'LETS FOLLOW THE SHASTRIC PRINCIPLES 'too that guides in every spheres of human activities!
M M Gupta, (Retired Chief engineer )

Arun arun.gurukkal@yahoo.com

Hindi sanskrit and constitution of India

Article 351 of constitution of India reads..... Directive for development of the Hindi language It shall be the duty of the Union to promote the spread of the Hindi language, to develop it so that it may serve as a medium of expression for all the elements of the composite culture of India and to secure its enrichment by assimilating without interfering with its genius, the forms, style and expressions used in Hindustani and in the other languages of India specified in the Eighth Schedule, and by drawing, wherever necessary or desirable, for its vocabulary, primarily on Sanskrit and secondarily on other languages PART XVIII EMERGENCY PROVISIONS

What is the percentage of Sanskrit words adopted by Hindi during last 70 years officially? and what is the percentage of vocabulary of other persian languages adopted? Would be ........ to know about the anti constitutional attitude of central govt. of the past and present.

arun prabhakaran



One daily Sanskrit paper is published from Mysore for the last 50 years. This paper has just sale of more than 3000 copies every day.

If some body wants to learn Sanskrit language then kindly promote the circulation of this paper by buying it for yourself and by offering as gift to libraries.



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1 Comments:

At 7:32 AM, Blogger भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

आंखे खोलने वाला लेख...

 

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